
समीक्षा: श्रीमद्भागवत की अंतर्कथाएं
पुस्तक का नाम: श्रीमद्भागवत की अंतर्कथाएं
लेखिका : डॉ.शैलबाला अग्रवाल
विधा : गद्य
प्रकाशक : निखिल पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, आगरा
मूल्य : 100/-
पृष्ठ : 80
समीक्षक: अशोक अश्रु विद्यासागर(संपादक: संस्थान संगम पत्रिका)
श्रीमद्भागवतपुराण में सभी ग्रंथों का सार है और यही एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें भगवान की सभी लीलाओं का वर्णन हमें देखने को मिलता है। श्रीमद्भागवत ग्रंथ से हम सभी परिचित हैं तथा इसकी कथाएं सुनने को मिलती रहती हैं। मगर कथा श्रवण के बाद उस पर अमल करने से ही पुण्य की प्राप्ती होती है। इस सत्य को अपनी सहज और सरल भाषा में डॉ.शैलबाला अग्रवाल ने अपने पाठकों के समक्ष अपनी नवीन पुस्तक ” श्रीमद्भागवत की अंतर्कथाएं” के माध्यम से रखा है।
उन्होंने पुस्तक के प्रारंभ में ‘लेखिका निवेदन’ में अपने मन की बात रखी है कि इसी वर्ष 13 मार्च कृष्णपक्ष पंचमी से अग्रवाल महिला समिति आगरा छावनी द्वारा अपने रजत जयंती वर्ष की बेला मनाते हुए श्रीबाँकेबिहारी ट्रस्ट द्वारा भगवत कथा का आयोजन सामूहिक सहयोग से रखा था। कथा में पधारे पंडित सौरभ पचौरी जी की वाणी में इस कथा की रस वर्षा नित्य हो रही थी। भागवत कथा का पान लेखिका ने बड़े मनयोग से एक आसान पर बैठकर किया। आनंद में निमग्न होते हुए लेखिका ने इसमें निहित रोचक अंतर्कथाओं को अति सामान्य भाषा में लिखकर और फिर प्रकाशित करवाकर जन सामान्य के मध्य लाने का संकल्प भगवत प्रेरणा से ले लिया था। इसी भगवत प्रेरणा ने डॉ.शैलबाला अग्रवाल की यशस्वी लेखनी के माध्यम से हिंदी साहित्य में “श्रीमद्भागवत की अंतर्कथाएं” पुस्तक की श्रीवृद्धि की है।
डॉ.शैलबाला अग्रवाल ने अपनी 80 पृष्ठीय पुस्तिका को 26 मणि रूपी शीर्षकों में पिरोया है। पुस्तक प्रारंभ करने से पूर्व सर्वप्रथम आपने श्रीमद्भागवत कथा की आरती को अपने भाव शब्दों में रचकर पृष्ठ 5 पर अवतरित किया है। कहा जा सकता है कि यह लेखिका का श्रीमद्भागवत कथा को नमन है। इस पुस्तक का प्रथम अध्याय ” श्रीमद्भागवत कीमहिमा कथा”* है। इसमें लेखिका ने कहा है कि यह ग्रंथ समाज के कल्याणार्थ रचा गया था। जिसे श्रवण करके ज्ञान और वैराग्य के साथ भगवान की भक्ति प्राप्त होती है। जिसमें कृष्ण की लीलाओं का रसास्वादन है। भागवत प्रेम का शास्त्र है, चूंकि प्रेम को पांचवाँ पुरूषार्थ माना गया है और भगवान प्रेम को ही अपना स्वरूप कहते हैं। पुस्तक के दूसरे अध्याय की बात की जाए तो इसमें लेखिका ने भगवान के 24 अवतारों की बात की है। लेखिका ने सार रूप में कहा है कि ईश्वर तो कण-कण में व्याप्त है और असंख्य रूपों में सर्वव्याप्त है। श्रीमद्भागवत की अंतर्कथाएं पुस्तक के जब पृष्ठ 15 पर पहुंचते हैं तो हमें ” गौकर्ण और धुंधकारी की कथा” पढ़ने को मिलती है। जिसमें ज्ञानी ब्राह्मण आत्मदेव की पत्नी धुंधली अधर्मी प्रवृत्ति की थी जो निसंतान थी। ब्राह्मण आत्मदेव ने अपनी पत्नी को सन्तानोत्पत्ति के लिए योगनिष्ठ ब्राह्मण से प्राप्त फल खाने के लिए दिया। प्रसव पीड़ा से बचने के लिए उसने फल स्वयं न खाकर गाय को खिला दिया। स्वयं प्रसब पीड़ा का नाटक करते हुए अपनी बहिन का पुत्र स्वयं का बताकर उसका लालन पालन किया। पति ने उसे अपना पुत्र समझते हुए उसका नाम धुंधकारी रखा तथा गाय ने भी मनुष्य रूपी बालक को जन्म दिया आत्मदेव ने उसका नाम गौकर्ण रखा। इसीलिए इस कथा को “गौकर्ण और धुंधकारी की कथा के रूप में मान्यता मिली।
जब हम गौकर्ण और धुंधकारी की कथा से आगे बढ़ते हैं तो हमें “दक्ष पुत्री सती की कथा”, “ध्रुव की कथा”, “महाराज अंग और वेन की कथा” तथा “प्रियव्रत की कथा”, को पढ़ने के बाद ऋषभदेव की कथा पर आते हैं। जहाँ राजा नाभि के रनिवास में महारानी मेरुदेवी के गर्भ से भगवान के वरदान स्वरूप दिगंबर सन्यासी के रूप में शुद्ध स्वरूपमय विग्रह से प्रभु ने अवतार लिया। जिनके अंग भगवान विष्णु के समान चिन्हों से युक्त थे.बड़े होकर वे अजनाखण्ड के राजा बने। उनके बड़े पुत्र का नाम भरत था। भरत के नाम से लोग इस अजनाखण्ड *को भारतवर्ष कहनेलगे थे। आगे बढ़ते हैं तो नवीं कथा के रूप में “भरत और जड़भरत की कथा है। पृष्ठ 32 से लेकर 66 तक “हिरण्यकश्यप वध और प्रहलाद की कथा”, “अजामिल की कथा”, “बावनावतार रूप में बलि का मान मर्दन कथा”, “सुदामा और श्रीकृष्ण की भेंट कथा”, “समुद्र मंथन की कथा”, “गंगा अवतरण की कथा”, “मर्यादा पुरुषोत्तम राम की कथा”, “श्रीकृष्ण की लीला कथा”, “महाभारत की कथा”, ” राजा अम्बरीष की कथा”, “महाराज पृथु की कथा” हैं। इस पुस्तक में इक्कीसवीं कथा के रूप में “पुरंजन की कथा” आती है। पुरंजन की कथा के बाद में “उद्धव-गोपी संवाद कथा और कृष्ण बलराम की ब्रज में मिलाप कथा”, शुकदेवजी द्वारा परीक्षित को उपदेश कथा”, का रसास्वादन करते हुए पुस्तक के चौबीसवें अध्याय की कथा “परीक्षित की परमगति और जन्मेजय की सर्पयज्ञ कथा” पर आते हैं। इसमें राजा परीक्षित को सर्पदंश की कथा का वर्णन है। जब परीक्षित के पुत्र जन्मेजय को पिता के सर्पदंश की घटना का पता चलता है तो वह कालसर्प यज्ञ का आयोजन करता है। यज्ञ के प्रभाव से सर्प भस्म होने लगते हैं। सर्प समूह में हाहाकार मच जाता है। सर्पों की प्रार्थना पर गुरु बृहस्पति प्रगट होते हैं तथा जन्मेजय को सद्परामर्श देकर उसे शांत करते हैं तथा यज्ञ का सर्पसत्र समाप्त कराते हैं। जिससे सर्पजाति की रक्षा होती है।
इसी प्रकार डॉ.शैलबाला अग्रवाल ने पुस्तक के पच्चीसवें अध्याय ” श्रीमद्भागवत महात्म्य कथा ” का वर्णन करते हुए बताया है कि श्रीमद्भागवत पुराण में 18000 श्लोक हैं। भगवतपुराण समस्त उपनिषदों का सार है। समस्त 18 पुराणों में श्रीमदभागवत पुराण को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इस पुस्तक का अंतिम अध्याय “श्रीमद्भागवत के अमृत तत्व” शीर्षक से है। जिसमें लेखिका ने कहा है कि भगवान परब्रह्म ही जगत का नियंता है सब उसी के नियंत्रण में रहता है। वह समस्त प्रकृति से ऊपर हैऔर समान दृष्टि भाव से सबको देखता है। उनका यह भी कहना है कि श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण और पाठ्य कलियुग में साक्षात श्रीकृष्ण की प्राप्ति कराने वाला और नित्य प्रेमानंद स्वरूप फल प्रदान करने वाला है।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि डॉ.शैलबाला अग्रवाल की पुस्तक श्रीमद्भागवत की अंतर्कथाएं को पढ़कर जिज्ञासु मन को सहज संतुष्टि प्राप्त होगी। विचारशील पाठक को समुचित सम्यक समाधान मिलेगा। भागवत की अंतर्कथाओं के परिदृश्य बहुआयामी हैं। इनमें जीवन के सभी आयाम और सोपान हैं। लौकिकता के साथ-साथ आध्यात्मिकता, परमार्थ, मोक्ष, पुरुषार्थ, व कृपा तथा सहज भक्ति के सभी तत्वों का समावेश है। इन अंतर्कथाओं के माध्यम से जीवन मार्ग में आने वाली विभिन्न बाधाओं का समाधान एवं मानव मन की संतुष्टि छिपी है। डॉ.शैलबाला अग्रवाल ने सहज सरल भाषा शैली के माध्यम से भगवत की अंतर्कथाओं को भगवान की भक्ति, भगवान के प्रति उन्मुखीकरण व भगवत सत्ता के प्रति अटूट विश्वास के साथ पाठक की चेतना को उर्ध्वगामी बनाने के लिए इस पुस्तक के रूप में छब्बीस दीपों को प्रज्वलित किया है जिसके लिए वह साधुवाद की पात्र हैं। मैं अपनी बात की इतिश्री निम्न कुंडलिनी से करता हूँ:-
श्रीमद् भगवत की कथा, भावों का श्री हार।
भक्त हृदय की ज्योत्सना, और मोक्ष का द्वार।
और मोक्ष का द्वार, शैल की पुस्तक प्यारी।
पुस्तक अस्सी पृष्ठ, छब्बीस जहाँ पर क्यारी।
कहे हृदय से ‘अश्रु’, पढ़ने से मिटती व्यथा।
रखो हृदय के पास, श्रीमद् भगवत की कथा।।
